रीवा संभाग के नौ जिलों में पिछले 5 महीने में लगभग दो हजार बच्चों की मौत ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है। रीवा में पांच सौ पचास, सतना में चार सौ तीस शहडोल में तीन सौ अठहत्तर, सीधी में दो सौ अड़तीस, सिंगरौली में एक सौ चौवन, उमरिया में एक सौ चौतीस और अनूपपुर में एक सौ बारह बच्चे इस अवधि में काल के गाल में समा गए, इसमें से अठ्ठाईस दिन की आयु के बच्चे भी थे, तो वहीं एक साल के भी, और एक से 5 साल के भी इन सभी कि जान अस्पताल में भर्ती होने के बाद गई यह तथ्य अत्यधिक गंभीर है, और अस्पतालों को कटघरे में खड़ा करने वाला है। अब वह जमाना गया जब यह कहकर जिम्मेदारी से मुकर लिया जाता था, कि बच्चों के परिजन उनकी हालत अत्यधिक खराब होने के बाद आए थे। इस तरह के कुछ उदाहरण हों तो भी जिम्मेदारी सरकार की है, खासकर अगर रीवा की बात करें तो रीवा के विधायक स्वास्थ्य मंत्री भी हैं, और उनके विधानसभा क्षेत्र में संचालित अस्पतालों कि मृत्यु दर चिंताजनक है। जिसके चलते अब प्रशासन के हाथ पांव फूल उठे हैं, शिशु मृत्यु दर नियंत्रण में पहले से कमजोर प्रदेशों में शुमार मध्य प्रदेश में यदि इतनी संख्या में बच्चों की जान जाती रहेगी, तो मृत्यु दर का ग्राफ नीचे लाना कहां संभव होगा पूरी स्थिति से यह तो साबित हो रहा है, कि स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से नवजातों तक नही पहुंच रहा बच्चे कमजोर पैदा हो रहे हैं, और कुपोषण का शिकार होकर गंभीर रूप से बीमार हो रहे हैं। इससे साफ नजर आता है कि गर्भवती महिलाओं के पोषण आहार में सुख टेक होम राशन प्रत्येक मंगलवार को आगनवाड़ी केंद्रों में ताजा भोजन खून वा आयरन की कमी दूर करने के लिए कैल्शियम और आयरन कि गोलियों के वितरण की व्यवस्था चौपट है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और अन्य जिम्मेदार संस्थाएं इस स्थिति का गंभीरता से मूल्यांकन करें वहीं लगातार 5 माह में दो हजार बच्चों कि मौत से उपजे सवाल पर रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल ने स्वीकार किया जो मृत्यु दर बढ़ी है। उसकी समीक्षा की जा रही है, साथ ही स्वास्थ्य और महिला बाल विकास अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए गए हैं, कि मृत्यु दर कम करने के प्रयास हो और इस पर रोक लगे।
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